इस्लामी जिहाद की वास्तविकता
कोड: 289978 दिनांक: 2012/01/10स्रोत: print

इस्लामी जिहाद की वास्तविकता


 इस्लामी जिहाद की वास्तविकता

मानव-सभ्यता एवं नागरिकता की आधारशिला जिस क़ानून पर स्थित है उसकी सबसे पहली धारा यह है कि मानव का प्राण और उसका रक्त सम्माननीय है। मानव के नागरिक अधिकारों में सर्वप्रथम अधिकार जीवित रहने का अधिकार है और नागरिक कर्तव्यों में सर्वप्रथम कर्तव्य जीवित रहने देने का कर्तव्य है। संसार के जितने धर्म-विधान और सभ्य विधि-विधान हैं, उन सब में प्राण-सम्मान का यह नैतिक नियम अवश्य पाया जाता है। जिस क़ानून और धर्म में इसे स्वीकार न किया गया हो, वह न तो सभ्य मानवों का धर्म और क़ानून बन सकता है, न उसके अन्तर्गत कोई मानव-दल शान्तिमय जीवन व्यतीत कर सकता है और न ही उसे कोई उन्नति प्राप्त हो सकती है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं समझ सकता है कि यदि मानव-प्राण का कोई मूल्य न हो, उसका कोई सम्मान न हो, उसकी सुरक्षा का कोई प्रबंध न हो तो चार आदमी कैसे मिलकर रह सकते हैं, उनमें किस तरह परस्पर कारोबार हो सकता है, उन्हें वह शान्ति एवं परितोष और वह निश्चिन्तता तथा चित्त की स्थिरता कैसे प्राप्त हो सकती है, जिसकी मनुष्य को व्यापार, कला और कृषि-कार्य, धनार्जन, गृह-निर्माण, यात्र एवं पर्यटन और सभ्य जीवन व्यतीत करने के लिए आवश्यकता होती है। फिर यदि आवश्यकताओं से हटकर मात्र मानवता की दृष्टि से देखा जाए तो इस दृष्टि से भी किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए या किसी व्यक्तिगत शत्रुता के कारण अपने एक भाई की हत्या करना निकृष्टतम निर्दयता और अत्यंत पाषाण हृदयता है। ऐसा अपराध करके मानव में किसी नैतिक उच्चता का पैदा होना तो अलग रहा, उसका मानवता के स्तर पर स्थित रहना भी असंभव है।

संसार के राजनैतिक क़ानून तो मानव-जीवन के सम्मान को केवल दंड के भय और शक्ति के बल पर स्थापित करते हैं किन्तु एक सत्यधर्म का काम दिलों में उसका वास्तविक मान-सम्मान पैदा कर देना है, ताकि जहाँ मानव द्वारा दिए जाने वाले दंड का भय न हो और जहाँ मनुष्य को पुलिस रोकने के लिए न हो वहाँ भी लोग एक-दूसरे की अकारण हत्या करने से बचते रहें। इस दृष्टिकोण से प्राण-सम्मान की जैसी यथोचित और प्रभावकारी शिक्षा इस्लाम में दी गई है वह किसी दूसरे धर्म में मिलनी कठिन है। क़ुरआन में जगह-जगह विभिन्न ढंग से इस शिक्षा को दिलों में बिठाने की कोशिश की गई है। क़ुरआन सूरा-5 अल-माइदा में आदम (अलैहि॰) के दो बेटों का क़िस्सा बयान करके, जिनमें से एक ने दूसरे की हत्या की थी और यह हत्या मात्र अत्याचार था, कहा गया है:

‘‘इसी कारण इसराईल की संतान के लिए हमने यह आदेश लिख दिया था कि जिसने किसी इन्सान को क़त्ल के बदले या ज़मीन में बिगाड़ फैलाने के सिवा किसी और वजह से क़त्ल कर डाला उसने मानो सारे ही इन्सानों को क़त्ल कर दिया, और जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सारे इन्सानों को जीवन दान किया। मगर उनका हाल यह है कि हमारे रसूल निरंतर उनके पास खुले-खुले निर्देश लेकर आये, फिर भी उनमें अधिकतर लोग धरती में ज़्यादतियाँ करने वाले हैं।’’ (कु़रआन, 5:32)

एक दूसरी जगह ईश्वर ने अपने नेक बन्दों के गुण बयान करते हुए कहा है :

‘‘ईश्वर के वर्जित किए हुए किसी जीव का नाहक़ क़त्ल नहीं करते, और न व्यभिचार करते हैं—ये काम जो कोई करेगा वह अपने गुनाह का बदला पाएगा।’’ (कु़रआन, 25:68)

एक और जगह कहा है:

‘‘ऐ नबी, उनसे कहो कि आओ मैं तुम्हें बताऊँ, तुम्हारे रब ने तुम पर क्या-क्या पाबन्दियाँ लगाई हैं: यह कि उसके साथ किसी को साझीदार न बनाओ, और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो और अपनी औलाद को निर्धनता के भय से क़त्ल न करो। हम तुमको भी रोज़ी देते हैं और उनको भी देंगे, और अश्लील बातों के क़रीब भी न जाओ चाहे वे खुली हुई हों या छिपी। और किसी जीव की, जिसे ईश्वर ने आदरणीय ठहराया है, हत्या न करो, सिवाय इस स्थिति के कि ऐसा करना सत्य को अपेक्षित हो। ये बातें हैं जिनका आदेश उसने तुम्हें दिया है, ताकि तुम समझ-बूझ से काम लो।’’ (कु़रआन, 6:151)

इस शिक्षा का संबोधन सर्वप्रथम उन लोगों से था जिनकी दृष्टि में मानव-प्राण का कोई मूल्य नहीं था और जो अपने व्यक्तिगत हित के लिए संतान तक की हत्या कर दिया करते थे। इसलिए इस्लाम की ओर बुलाने वाले पैग़म्बर (उन पर हज़ारों-हज़ार सलाम हों) उनकी मनोवृत्तियों के सुधार के लिए स्वयं भी सदैव प्राण-सम्मान का उपदेश दिया करते थे और यह उपदेश सदैव अत्यंत प्रभावकारी शैली में हुआ करता था। हदीसों में अधिकतर इस प्रकार के कथन पाए जाते हैं जिनमें निर्दोष की हत्या को निकृष्टतम पाप बताया गया है। उदाहरणस्वरूप कुछ हदीसें हम यहाँ उद्धृत करते हैं:

हज़रत अनस बिन मालिक (रज़ि॰) से उल्लिखित है कि ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा:

‘‘बड़े गुनाहों में सबसे बड़ा गुनाह ईश्वर का सहभागी ठहराना है और जीव-हत्या तथा माता-पिता की अवज्ञा एवं झूठ बोलना है।’’

हज़रत इब्ने-उमर (रज़ि॰) से उल्लिखित है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा:

‘ईमान वाला अपने धर्म की विस्तीर्णता में उस समय तक निरंतर रहता है जब तक वह कोई अवैध रक्त-पात नहीं करता।’

हदीसशास्त्र ‘नसई’ में एक ‘मुतवातिर’1 (वह हदीस जिसके उल्लेखकर्ता हर ज़माने में इतने अधिक रहे हों कि उनका किसी झूठ पर सहमत हो जाना संभव न हो।) हदीस है कि ‘‘क़ियामत (प्रलय-दिवस) के दिन बन्दे से सबसे पहले जिस चीज़ का हिसाब लिया जाएगा, वह नमाज़ है और पहली चीज़ जिसका निर्णय लोगों के मध्य किया जाएगा, वे ख़ून के दावे हैं।’’

एक बार एक व्यक्ति हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की सेवा में उपस्थित हुआ और उसने पूछा, ‘‘सबसे बड़ा गुनाह कौन-सा है?’’ हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने जवाब दिया, ‘‘यह कि तू किसी को ईश्वर का समकक्ष एवं प्रतिद्वंद्वी ठहराए, जबकि उसने तुझे पैदा किया।’’

उसने फिर पूछा कि, ‘‘इसके बाद कौन-सा गुनाह बड़ा है?’’ पैग़म्बर (सल्ल॰) ने उत्तर दिया, ‘‘यह कि तू अपने बच्चे की हत्या कर दे, इस विचार से कि वह तेरे खाने में साझीदार होगा।’’

उसने कहा, ‘‘इसके बाद कौन-सा गुनाह है?’’ पैग़म्बर (सल्ल॰) ने कहा, ‘‘यह कि तू अपने पड़ोसी की पत्नी से व्यभिचार करे।’’

संसार पर इस्लामी शिक्षा का नैतिक प्रभाव

प्राण-सम्मान की यह शिक्षा किसी दार्शनिक या नैतिक शिक्षक के चिंतन का परिणाम न थी कि इसका प्रभाव केवल पुस्तकों और पाठशालाओं तक सीमित रहता, बल्कि वास्तव में वह ईश्वर और उसके पैग़म्बर की शिक्षा थी जिसका एक-एक शब्द प्रत्येक मुसलमान के ईमान का अंश था, जिसका पालन करना, उपदेश देना और जिसे क्रियान्वित करना हर व्यक्ति का कर्तव्य था जो इस्लाम के कलिमे (महावाक्य और इस्लामी धारणा) को स्वीकार करता हो। अतः एक चैथाई शताब्दी के अल्प समयम ही में इसके कारण अरब जैसी हिंसक जाति में प्राण-सम्मान और शान्तिप्रियता का ऐस गुण पैदा हो गया कि ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की भविष्यवाणी के अनुसार क़ादसिया से सनआ तक एक महिला अकेली सफ़र करती थी और कोई उसकी जान और माल पर हमला न करता था, जबकि यही वह देश था जहाँ 25 वर्ष पूर्व बड़े-बड़े क़ाफ़िले भी निश्चिन्त होकर नहीं गुज़र सकते थे। फिर जब सभ्य संसार का आधे से अधिक भाग इस्लामी राज्य के अधीन हो गया और इस्लाम के नैतिक प्रभाव संसार में चारों ओर फैल गए तो इस्लामी शिक्षा ने मनुष्य के बहुत-से भ्रष्टाचारों और गुमराहियों की तरह मानव-प्राण के उस निरादर का भी उन्मूलन कर दिया जो संसार में फैला हुआ था। आज संसार के सभ्य क़ानूनों में प्राण-सम्मान को जो स्थान प्राप्त हुआ है वह उस क्रान्ति के परिणामों में से एक शानदार परिणाम है जो क्रान्ति इस्लामी शिक्षा के फलस्वरूप संसार के नैतिक वातावरण में आई थी। अन्यथा जिस अंधकारमय काल में यह शिक्षा अवतरित हुई थी उसमें मानव-प्राण का वास्तव में कोई मूल्य न था। अरब की हिंसक प्रवृत्तियों का नाम तो इस सिलसिले में दुनिया ने बहुत सुना है, किन्तु उन देशों की स्थिति भी कुछ अच्छी न थी जो उस समय संसार की सभ्यता, सुसंस्कृति और ज्ञान तथा दर्शन के केन्द्र बने हुए थे। रूम के कोलोसियम (Colosseum) की कहानियाँ अब तक इतिहास के पृष्ठों में मौजूद हैं, जिनमें हज़ारों मनुष्य तलवार चलाने की कला (Gladiatory) की कुशलताओं और रोम के सरदारों के मनोरंजन की भेंट चढ़ गए। अतिथियों के मनोरंजन के लिए या मित्रों के सत्कार के लिए ग़ुलामों को हिंसक पशुओं से फड़वा देना या पशुओं की तरह ज़बह (वध) करा देना या उनके जलने का तमाशा देखना यूरोप और एशिया के अक्सर देशों में कोई बुरा काम न था। क़ैदियों और ग़ुलामों को विभिन्न ढंग से यातना दे-देकर मार डालना उस युग की सामान्य रीति थी। जाहिल और हिंसक प्रवृत्ति के सरदारों ही में नहीं यूनान और रोम के बड़े-बड़े चिंतकों और दार्शनिकों तक के अनुशीलनों और निरूपणों में मनुष्य के निर्दोष वध करने की बहुत-सी असभ्य रीतियाँ वैध थीं। अरस्तू और प्लेटो जैसे नैतिक शिक्षक माता को यह अधिकार देने में कोई दोष नहीं समझते थे कि वह अपने शरीर के एक अंश (गर्भाशय में पलते हुए बच्चे) को अलग कर दे। अतएव यूनान और रोम में गर्भपात कराना कोई अवैध कर्म न था। पिता को अपनी संतान के वध का पूरा अधिकार था और रोम के क़ानूनविदों को अपने क़ानून की इस विशेषता पर गर्व था कि उसमें संतान पर पिता के अधिकार इतने अधिक असीम हैं। स्टोइक (Stoics) दार्शनिक की दृष्टि में मनुष्य का स्वयं अपने आपका वध करना कोई बुरा काम न था, बल्कि ऐसा श्रेष्ठ कार्य था कि लोग सभाएँ आयोजित करके उनमें आत्महत्याएँ किया करते थे। यहाँ तक कि प्लेटो जैसा दार्शनिक भी इसे कोई बहुत बड़ा पाप न समझता था। पति के लिए अपनी पत्नी का वध बिल्कुल ऐसा था जैसे वह अपने किसी पालतू पशु का वध कर दे। इसलिए यूनान के क़ानून में इसका कोई दंड न था। जीव-रक्षा का गहवारा भारत इन सबसे बढ़ा हुआ था। यहाँ पुरुष के शव पर जीवित स्त्री को जला देना एक वैध कर्म था और धर्म में इसकी ताकीद थी। शूद्र के प्राण का कोई मूल्य न था और केवल इस कारण कि वह बेचारा शूद्र ब्रह्मा के पाँव से पैदा हुआ है, उसकी हत्या ब्राह्मण के लिए वैध थी। वेद की आवाज़ सुन लेना शूद्र के लिए इतना बड़ा पाप था कि उसके कान में पिघला हुआ सीसा डालकर उसे मार डालना न केवल वैध, बल्कि आवश्यक था। ‘जलबरदा’ की प्रथा सामान्य रूप से प्रचलित थी जिसके अनुसार माता-पिता अपने पहले बच्चे को गंगा नदी की भेंट चढ़ा देते थे और इस कठोर हृदयता को अपने लिए सौभाग्य समझते थे।

ऐसे अंधकारमय युग में इस्लाम ने आवाज़ बुलन्द की कि, ‘‘मानव-प्राण को ईश्वर ने प्रतिष्ठित ठहराया है, उसकी हत्या न करो, किन्तु उस समय जबकि सत्य और न्याय उसकी हत्या की माँ करे।’’ (कु़रआन, 6:151) इस आवाज़ में एक शक्ति थी और शक्ति के साथ वह ‘अहिंसा परमो धर्मः’ (अहिंसा परम धर्म है) की आवाज़ की तरह बुद्धि और प्रकृति के प्रतिवू$ल न थी, इसलिए वह संसार के कोने-कोने में पहुँची और उसने मानव को अपने प्राण के यथोचित मूल्य से अवगत कराया। चाहे किसी जाति या किसी देश ने इस्लाम स्वीकार किया हो या न किया हो, उसका नैतिक जीवन किसी न किसी हद तक इस आवाज़ से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। सामाजिक इतिहास का कोई न्यायप्रिय विद्वान इससे इन्कार नहीं कर सकता कि संसार के नैतिक क़ानूनों में मानव-प्राण के सम्मान को प्रतिष्ठित रखने का गौरव जितना इस आवाज़ को प्राप्त है उतना ‘पहाड़ी के उपदेश’ या ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की आवाज़ को प्राप्त नहीं है।

क़त्ल जब सत्य और न्याय को अपेक्षित हो

तनिक विचार कीजिए, केवल ‘‘मानव-प्राण की, जिसे ईश्वर ने प्रतिष्ठित ठहराया है, हत्या न करो’’ ही नहीं कहा, बल्कि इसके साथ ‘‘किन्तु उस समय जबकि सत्य और न्याय उसकी हत्या की माँग करे’’ भी कहा है। ‘‘जिसने एक व्यक्ति की हत्या की मानो कि उसने समस्त मानवों की हत्या कर दी’’ ही नहीं कहा, बल्कि इसके साथ ‘‘किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के अतिरिक्त’’ का अपवाद भी रखा है। यह नहीं कहा कि किसी जान का किसी स्थिति में भी वध न करो। ऐसा कहा जाता तो यह शिक्षा का दोष होता। न्याय न होता, बल्कि वास्तव में अन्याय होता। संसार को वास्तव में आवश्यकता इस बात की न थी कि मनुष्य को क़ानून की पकड़ से आज़ाद कर दिया जाए और उसे खुली छूट दे दी जाए कि जितना चाहे फ़साद करे, जितनी चाहे अशान्ति फैलाए, जितना चाहे अत्याचार करे, प्रत्येक स्थिति में उसके प्राण का सम्मान किया जाएगा (अर्थात् उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा)। बल्कि वास्तव में आवश्यकता यह थी कि संसार में शान्ति की स्थापना हो, बिगाड़ और उपद्रव का उन्मूलन कर दिया जाए और ऐसा क़ानून बनाया जाए जिसके अंतर्गत हर व्यक्ति अपनी सीमाओं में स्वतंत्र हो और कोई व्यक्ति एक निश्चित सीमा का उल्लंघन करके दूसरों की भौतिक या आध्यात्मिक शान्ति में विघ्न न डाले। इस उद्देश्य के लिए केवल ‘‘जीव-हत्या न करो’’ का समर्थन ही अपेक्षित न था, बल्कि इस रक्षक-शक्ति की भी आवश्यकता थी कि ‘‘यदि सत्य और न्याय को अपेक्षित हो’’ तो (अपराधी को) क़त्ल भी किया जा सकता है, अन्यथा शान्ति की जगह अशान्ति ही होती।

दुनिया का कोई क़ानून, जो कर्म के बदले के नियम से रिक्त हो, सफल नहीं हो सकता। मानव-प्रकृति इतनी आज्ञाकारी नहीं है कि जिस चीज़ का आदेश दिया जाए उसे सदा सहर्ष स्वीकार कर ही ले और जिस चीज़ से रोका जाए, उसे सहर्ष त्याग ही दे। यदि ऐसा होता तो संसार में उपद्रव और बिगाड़ नाममात्रा को न होता। मनुष्य की प्रकृति में तो भलाई के साथ बुराई और आज्ञापालन के साथ अवज्ञा भी पाई जाती है। अतः उसकी उद्दंड प्रकृति को आज्ञापालन पर बाध्य करने के लिए ऐसे क़ानून की आवश्यकता है जिसमें आदेश देने के साथ यह भी हो कि यदि आदेश का पालन न किया गया तो उसका दंड क्या है और वर्जित करने के साथ यह भी हो कि यदि वर्जित कर्म से बचा न गया तो उसका परिणाम क्या भुगतना पड़ेगा। केवल ‘‘धरती के सुधार के बाद उसमें बिगाड़ पैदा न करो’’ या ‘‘जिस प्राणी को ईश्वर ने प्रतिष्ठित किया है उसकी हत्या न करो’’ कहना पर्याप्त नहीं हो सकता, जब तक कि इसके साथ यह भी न बता दिया जाए कि यदि इस महापाप से किसी ने अपने को दूर न रखा और फ़साद फैलाया और रक्तपात किया तो उसे क्या दंड दिया जाएगा।

मानव-शिक्षा में ऐसी त्रुटि का रह जाना संभव है, किन्तु ईश्वरीय क़ानून इतना दोषपूर्ण (होना तो दूर की बात, तनिक भी दोषपूर्ण) नहीं हो सकता। उसने स्पष्ट रूप से बता दिया कि मानव-रक्त की प्रतिष्ठा केवल उसी समय तक है, जब तक उस पर ‘हक़’ (सत्य और न्याय) न क़ायम हो जाए। (जब तक कि वह अपराध करके स्वयं उस प्रतिष्ठा को भंग न कर दे।) उसे जीवन का अधिकार केवल वैध सीमाओं के भीतर ही दिया जा सकता है, किन्तु जब वह उन सीमाओं का उल्लंघन करके उपद्रव और फ़साद फैलाए या दूसरों के प्राण पर आक्रमण करे तो वह अपने जीवन-अधिकार को स्वयं खो देता है और उसका वध वैध हो जाता है और फिर उसकी मृत्यु ही मानवता का जीवन हो जाती है। अतएव कहा गया है कि, ‘‘हत्या बड़ी बुरी चीज़ है किन्तु उससे अधिक बुरी चीज़ फ़साद एवं उपद्रव है।’’ जब कोई व्यक्ति यह बड़ा अपराध करे तो उसकी बड़ी बुराई का अंत कर देना ही ज़्यादा अच्छा है। इसी प्रकार जो कोई किसी दूसरे निर्दोष व्यक्ति की अन्यायपूर्ण हत्या करे, उसके लिए आदेश हुआ ‘‘ मारे जाने वालों के विषय में हत्या-दंड (क़िसास) तुम पर अनिवार्य किया गया’’ (कु़रआन, 2:178)। इसके साथ उस भेदभाव को भी मिटा दिया गया जिसे गुमराह क़ौमों ने उच्च और निम्न वर्ग के लोगों में क़ायम किया था। अतएव कहा गया ‘‘हमने उस (तौरात) में उनके लिए लिख दिया था कि प्राण प्राण के बराबर है’’ (क़ुरआन, 5:45)। यह नहीं हो सकता कि अमीर ग़रीब को मार डाले या आज़ाद व्यक्ति ग़ुलाम की हत्या कर दे तो वह छोड़ दिया जाए, बल्कि मनुष्य होने की दृष्टि से सब बराबर हैं। प्राण के बदले प्राण ही लिया जाएगा, चाहे धनी का प्राण हो या निर्धन का। फिर इस विचार से कि किसी को इस अवश्यम्भावी रक्तपात में झिझक न हो, कहा गया, ‘‘ऐ बुद्धिमानो! तुम्हारे लिए प्राण-दंड में जीवन है।’’ (2:179); अर्थात् ऐ बुद्धिमानो! इस प्राण-दंड को मृत्यु न समझो, बल्कि यह तो वास्तव में समाज का जीवन है जो उसके शरीर से एक दूषित और घातक फोड़े को काटकर प्राप्त किया जाता है। प्राण-दंड से प्राप्त होने वाले जीवन के इस दर्शन को पैग़म्बर (सल्ल॰) ने एक अवसर पर भली-भाँति समझाया है। आप (सल्ल॰) ने कहा, ‘‘अपने भाई की सहायता करो, चाहे वह अत्याचारी हो या अत्याचार-पीड़ित।’’ सुनने वाले को आश्चर्य हुआ कि अत्याचार-पीड़ित की सहायता तो उचित है, किन्तु अत्याचारी की यह सहायता कैसी? पूछा, ‘‘ऐ ईशदूत! हम अत्याचार-पीड़ित की सहायता तो अवश्य करेंगे, किन्तु अत्याचारी की सहायता किस तरह करें?’’ आप (सल्ल॰) ने कहा, ‘‘इस तरह कि तू उसका हाथ पकड़ ले और उसे अत्याचार करने से रोक दे।’’ अतः वस्तुतः ज़ालिम के जु़ल्म को रोकने में उसके साथ जो सख़्ती भी की जाए, वह सख़्ती नहीं है, बल्कि वह नर्मी ही है और स्वयं उस अत्याचारी की भी सहायता ही है। इसीलिए इस्लाम में ईश्वरीय हद को क़ायम करने (ईश्वर की ओर से निर्धारित दंडों को व्यवहार में लाने) की सख़्ती के साथ ताकीद की गई है और इसे दयालुता और उसके प्रसाद का कारण बताया गया है। ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा है, ‘‘ईश्वर की हदों में से एक हद क़ायम करने की बरकत चालीस दिन की वर्षा से अधिक है।’’ वर्षा की बरकत यह है कि इससे धरती सिंचित होती है, फ़सलें भली-भाँति तैयार होती हैं, ख़ुशहाली में वृद्धि होती है। किन्तु हद के क़ायम करने (अर्थात दंड-विधान को लागू करने) की बरकत और लाभ इससे बढ़कर है क्योंकि इससे उपद्रव, बिगाड़, अत्याचार और अशान्ति का उन्मूलन होता है, ईश्वर के पैदा किए हुए प्राणियों को शान्तिपूर्वक जीवन व्यतीत करने का अवसर प्राप्त होता है और शान्ति-स्थापना से वह परितोष उपलब्ध होता है जो सामाजिकता की आत्मा और उन्नति का प्राण है।

सत्य एवं न्याय को ‘अपेक्षित’ और ‘अनपेक्षित’ क़त्ल में अन्तर

सत्य और न्याय के अनपेक्षित क़त्ल को ऐसी कड़ाई के साथ रोककर और सत्य और न्याय को अपेक्षित क़त्ल की ऐसी ताकीद करके ईश्वरीय धर्म-विधान ने अतिशयता और न्यूनता के दो मार्गों के मध्य न्याय और बीच के सीधे मार्ग की ओर हमारा मार्गदर्शन किया है। एक ओर वह मर्यादाहीन और सीमोल्लंघन करने वाला गिरोह है जो मानव-प्राण का कोई मूल्य नहीं समझता और अपनी तुच्छ इच्छाओं पर उसे बलिदान कर देना वैध समझता है। दूसरी ओर वह विवेकभ्रष्ट और दृष्टिभ्रष्ट गिरोह है जो रक्त की पवित्रता और उसकी शाश्वत अवैधता का मानने वाला है और किसी स्थिति में भी रक्त बहाना वैध नहीं समझता। इस्लामी धर्म-विधान ने इन दोनों ग़लत विचारों का खंडन कर दिया और उसने बताया कि मानव-प्राण की प्रतिष्ठा न तो काबा या माँ-बहन की प्रतिष्ठा की तरह शाश्वत है कि किसी प्रकार उसे क़त्ल करना वैध ही न हो सके और न उसका मूल्य इतना कम है कि अपनी तुच्छ भावनाओं एवं इच्छाओं की तृप्ति के लिए उसका वध कर देना वैध हो। एक ओर उसने बताया कि मानव-प्राण इसलिए नहीं है कि मनोरंजन के लिए घातक दशा में उसके तड़पने का तमाशा देखा जाए, उसको जलाकर या यातनाएँ देकर आनन्द लिया जाए, उसको व्यक्तिगत इच्छाओं की राह में रुकावट समझकर उसका अन्त कर दिया जाए या तथ्यहीन अंधविश्वासों और ग़लत रीतियों की वेदी पर उसकी भेंट चढ़ाई जाए। ऐसे अपवित्रा उद्देश्यों के लिए उसका ख़ून बहाना निश्चय ही अवैध और महापाप है। दूसरी ओर उसने यह भी बताया कि एक चीज़ मानव-प्राण से भी अधिक मूल्यवान है और वह ‘हक़’ (सत्य एवं न्याय) है। वह जब उसके ख़ून की माँग करे तो उसे बहाना न केवल वैध बल्कि अनिवार्य है और उसको न बहाना सबसे बड़ा गुनाह है। मनुष्य जब तक सत्य का आदर करता है उसके ख़ून का आदर करना आवश्यक होता है, किन्तु जब वह उद्दंड होकर सत्य पर हाथ बढ़ाए तो वह अपने ख़ून का मूल्य स्वयं खो देता है। फिर उसके ख़ून का मूल्य इतना भी नहीं रहता, जितना पानी का होता है।

अवश्यम्भावी रक्तपात

सत्य और न्याय को अपेक्षित क़त्ल यद्यपि देखने में सत्य के अनपेक्षित क़त्ल की तरह रक्तपात ही है, किन्तु वास्तव में यह अवश्यम्भावी रक्तपात है जिससे किसी दशा में छुटकारा नहीं। इसके बिना न संसार में शान्ति स्थापित हो सकती है, न बुराई और फ़साद की जड़ कट सकती है, न नेक लोगों को बुरों की दुष्टता से मुक्ति मिल सकती है, न हक़दार को हक़ मिल सकता है, न ईमानदारों को ईमान और अन्तरात्मा की स्वतंत्राता प्राप्त हो सकती है, न उद्दंडों को उनकी वैध सीमाओं में सीमित रखा जा सकता है और न ईश्वर के प्राणियों को भौतिक एवं आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त हो सकती है। यदि इस्लाम पर ऐसे रक्तपात का आरोप है तो उसे इस आरोप को स्वीकार करने में तनिक भी लज्जा नहीं। किन्तु (यदि ऐसे रक्तपात को निन्दनीय मान भी लिया जाए तो) प्रश्न यह है कि फिर और कौन है जिसका दामन इस अवश्यम्भावी रक्तपात के छींटों से रंजित नहीं है?

बौद्धमत की अहिंसा इसको वैध ठहराती है, किन्तु वह भी भिक्षु और गृहस्थ में अन्तर करने पर विवश हुई और अंततः उसने एक छोटे गिरोह के लिए मुक्ति (निर्वाण) को आरक्षित रखने के पश्चात् शेष सम्पूर्ण संसार को कुछ नैतिक आदेश देकर गृहस्थधर्म स्वीकार करने के लिए छोड़ दिया, जिसमें राजनीति, दंड-विधान और युद्ध सब कुछ है।

इसी प्रकार ईसाइयत भी युद्ध को सर्वथा अवैध ठहराने के बावजूद अन्ततः युद्ध के लिए विवश हुई और जब रोम साम्राज्य के अत्याचारों को सहन करना उसके लिए असंभव हो गया तो अन्ततः उसने स्वयं राज्य पर क़ब्ज़ा करके ऐसा युद्ध छेड़ा जो अवश्यम्भावी रक्तपात की सीमा से बहुत आगे निकल गया।

हिन्दू धर्म में भी अर्वाचीन दार्शनिकों ने ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की धारणा प्रस्तावित की और जीव-हत्या को पाप ठहराया। किन्तु जब इस संबंध में क़ानूनविद् मनु से धर्मादेश (फ़तवा) मालूम किया गया कि ‘‘यदि कोई व्यक्ति हमारी स्त्रियों पर हाथ डाले या हमारा धन छीने, हमारे धर्म का अपमान करे तो हम क्या करें?’’ तो उसने उत्तर दिया कि ‘‘ऐसे अत्याचारी व्यक्ति को अवश्य मार डालना चाहिए, भले ही वह गुरु हो या विद्वान ब्राह्मण, बूढ़ा हो या नवयुवक।’’

गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं व बहुश्रुतम्।

आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।।

(मनु 8/350)

अर्थात

‘‘गुरु, बालक, वृद्ध या बहुत शास्त्रों का जानने वाला ब्राह्मण भी आततायी होकर आए तो उसे बेखटके मार डाले।’’

यहाँ धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करके इस अवश्यम्भावी रक्तपात की आवश्यकता सिद्ध करने का अवसर नहीं है। धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन एक अलग चीज़ है जिसे यथावसर प्रस्तुत किया जाएगा और उस समय यह सिद्ध हो जाएगा कि जो धर्म युद्ध को बुरा समझते हैं, वे भी व्यावहारिक जगत् में पदार्पण के पश्चात् इस अवश्यम्भावी चीज़ से अपने आपको अलग रखने में असमर्थ रहे हैं। इस समय हमारा उद्देश्य केवल यह दिखाना है कि नैतिक प्रदर्शन के लिए कोई गिरोह चाहे कैसे ही ऊँचे काल्पनिक दर्शनों तक पहुँच जाए, किन्तु व्यावहारिक जगत में आकर उसे संसार की तमाम समस्याओं को व्यवहारतः हल करना पड़ता है और यह संसार स्वयं उसको विवश कर देता है कि वह उसके यथार्थ का व्यावहारिक उपायों से मुक़ाबला करे। कु़रआन अवतरित करने वाले (ईश्वर) के लिए यह कुछ कठिन कार्य न था कि वह प्राण-सम्मान के लिए उसी प्रकार के काल्पनिक, आनन्ददायक नियम प्रस्तुत करता, जैसे कि अहिंसा की धारणा में पाए जाते हैं और निश्चय ही वह अपनी चामत्कारिक वाणी में उनको प्रस्तुत करके संसार को आश्चर्यचकित कर सकता था। किन्तु उस जगत्-स्रष्टा को भाषण और दार्शनिकता का प्रदर्शन अभीष्ट न था, बल्कि वह अपने बन्दों के लिए एक सत्यानुवू$ल और स्पष्ट व्यवहार-संहिता प्रस्तुत करना चाहता था, जिसका पालन करके उनका लोक और धर्म दोनों सँवर सके। इसलिए जब उसने देखा कि ‘‘यह और बात है कि सत्य और न्याय को (क़त्ल) अपेक्षित हो’’ के अपवाद के बिना, मात्रा ‘जीव-हत्या न करो’ का सामान्य आदेश लाभदायक नहीं हो सकता तो यह उसकी अवगुणरहित सत्ता के प्रतिवू$ल था कि दुनिया वालों को ‘‘तुम वह बात क्यों कहते हो जो करते नहीं हो’’ (क़ुरआन, 61:3), का ताना देने के बावजूद वह उन्हें यह सिखाता कि ज़बान से ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की आवाज़ बुलन्द करो और हाथ से ख़ूब तलवार चलाते रहो। अतः यह ईश्वर की पूर्ण तत्वदर्शिता ही थी कि उसने प्राण-सम्मान की शिक्षा के साथ प्राण-दंड का क़ानून भी निर्धारित किया और इस तरह उस शक्ति को प्रयुक्त करने को आवश्यक ठहराया जिसका प्रयोग प्राण-प्रतिष्ठा की सुरक्षा के लिए अवश्यम्भावी है।

सामूहिक उपद्रव

यह प्राण-दंड का क़ानून जिस प्रकार व्यक्तियों के लिए है उसी प्रकार समूहों के लिए भी है। जिस प्रकार व्यक्ति उद्दंड होते हैं, उसी प्रकार गिरोह और क़ौमें भी उद्दंड होती हैं। जिस प्रकार व्यक्ति लालच और लोलुपता से अभिभूत होकर सीमोल्लंघन कर जाते हैं, उसी प्रकार गिरोह और क़ौमों में भी यह नैतिक रोग पैदा हो जाया करता है। अतः जिस प्रकार व्यक्तियों को क़ाबू में रखने और उन्हंे अत्याचार से रोकने के लिए युद्ध अवश्यम्भावी हो जाता है उसी प्रकार गिरोहों और क़ौमों के बढ़ते हुए दुष्कर्मों को रोकने के लिए भी युद्ध अवश्यम्भावी हो जाता है। आकार-प्रकार की दृष्टि से व्यक्तिगत और सामूहिक उपद्रव में कोई अन्तर नहीं है, किन्तु प्रकृति की दृष्टि से बहुत बड़ा अन्तर है। व्यक्तियों के उपद्रव का क्षेत्रा अत्यंत सीमित होता है, मनुष्यों के एक छोटे समूह को उससे कष्ट पहुँचता है और गज़ भर धरती रक्त-रंजित करके उसका उन्मूलन किया जा सकता है। किन्तु गिरोहों का उपद्रव एक असीम संकट होता है जिससे अनगिनत मनुष्यों की ज़िन्दगी दूभर हो जाती है, पूरी-पूरी क़ौमों का जीवन संकीर्ण होकर रह जाता है। सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था में एक हलचल पैदा हो जाता है और उसका उन्मूलन ख़ून की नदियाँ बहाए बिना नहीं हो सकता, जिसे कुरआन में ‘धरती में रक्तपात’ (कु़रआन, 8:67) के अर्थयुक्त शब्द से अभिव्यंजित किया गया है।

गिरोह जब उद्दंडता पर उतर आते हैं तो वे कोई एक उपद्रव नहीं मचाते, बल्कि उनमें तरह-तरह के शैतान सम्मिलित होते हैं इसलिए तरह-तरह की शैतानी ताक़तें उनके तूफ़ान में उभर आती हैं और हज़ारों प्रकार के उपद्रव उनके कारण उठ खड़े होते हैं। कुछ उनमें धन-दौलत के लालची होते हैं तो वे ग़रीब क़ौमों पर डाके डालते हैं, उनके व्यापार पर क़ब्ज़ा करते हैं, उनके उद्योगों को नष्ट करते हैं, उनके परिश्रम से कमाए हुए धन को विभिन्न प्रकार की चालाकियों से लूटते हैं और ताक़त के बल पर उस धन से अपने कोष भरते हैं जिसके वैध अधिकारी वे भूखी, पीड़ित क़ौमें होती हैं। कुछ उनमें अपनी तुच्छ इच्छाओं के दास होते हैं। वे अपने जैसे मानवों को ख़ुदा बना बैठते हैं, अपनी इच्छाओं पर निर्बलों के अधिकारों की बलि चढ़ाते हैं। न्याय को मिटाकर अन्याय और अत्याचार के झंडे बुलन्द करते हैं। सज्जनों और नेक लोगों को दबाकर मूर्खों और कमीनों को ऊँचा उठाते हैं, उनके अपवित्र प्रभाव से क़ौमों के नैतिक गुण नष्ट हो जाते हैं, सद्गुणों और श्रेष्ठताओं के स्रोत सूख जाते हैं और उनकी जगह विश्वासघात, दुष्कर्म, अश्लीलता, कठोर हृदयता, अन्याय और अनगिनत अन्य नैतिक दुर्गुणों के गन्दे नाले जारी हो जाते हैं। फिर उनमें कुछ वे होते हैं जिन पर देश एवं विश्व-विजय का भूत सवार होता है वे निरुपाय और निर्बल क़ौमों की आज़ादियाँ छीन लेते हैं। ख़ुदा के बेगुनाह बन्दों के ख़ून बहाते हैं, अपनी सत्तालोलुपता को पूरा करने के लिए धरती में फ़साद फैलाते हैं और स्वतंत्र मानवों को उस गु़लामी का तौक़ पहनाते हैं जो समस्त नैतिक बिगाड़ की जड़ है। इन शैतानी कामों के साथ जब धर्म में ज़ोर-ज़बरदस्ती भी शामिल हो जाती है और इन अत्याचारी गिरोहों में से कोई गिरोह अपने स्वार्थों के लिए धर्म को प्रयोग करके ख़ुदा के बन्दों को धार्मिक स्वतंत्रता से भी वंचित कर देता है और दूसरों पर इसलिए अत्याचार करता है कि वे उसके धर्म के बजाय अपने धर्म का पालन क्यों करते हैं, तो यह संकट और भी गंभीर हो जाता है।
(इस्लामी धर्म एकता परिषद)

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