इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम
कोड: 324330 दिनांक: 2012/06/24 - 00:04स्रोत: print

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, प्रशंसनीय व्यवहार और उच्च विशेषताओं के स्वामी मनुष्य का स्पष्ट प्रतीक हैं... 

 इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम
आज एक एसे महान व्यक्ति का शुभ जन्मदिवस है जिसने सुन्दरता और प्रेम का अर्थ स्पष्ट किया। आज इमाम हुसैन का शुभ जन्म दिवस है। वे सुन्दर आत्मा, आत्म गरिमा और गहरी पहचान के स्वामी थे तथा दूसरे शब्दों में वे एक परिपूर्ण व्यक्ति का नमूना थे। ईश्वर की कृपा हो उनपर और हम इस शुभ अवसर पर आप सबको बधाई प्रस्तुत करते हैं।
सुन्दरता हर मनुष्य को पसंद होती है। यदि मनुष्य स्वयं पर दृष्टि डाले तो वह अपने भीतर उस सुन्दरता को पाएगा जो ईश्वर की निशानी है। तत्वदर्शियों ने यह कहा है कि मनुष्य, सभी प्राणियों में सबसे सुन्दर है। उसकी सृष्टि अद्वितीय एवं सुन्दर है। फ़्रांसीसी दार्शनिक कांट कहते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए मैंने दो चीज़ों को देखा। एक आकाश को, जिसकी सृष्टि महान है और दूसरे स्वयं अपने अंतरमन को। यह दोनो आश्चर्य का कारण बनते हैं और सुन्दरता के पर्दों को खोलते हैं। 
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, प्रशंसनीय व्यवहार और उच्च विशेषताओं के स्वामी मनुष्य का स्पष्ट प्रतीक हैं। वे पैग़म्बरे इस्लाम (स) के नाती तथा हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा के सुपुत्र थे। उनका पालन-पोषण एवं प्रशिक्षण ईश्वरीय संदेश वहि उतरने वाले घर और पैग़म्बरे इस्लाम के परिवार के आध्यात्मिक वातावरण में हुआ था। यह दोनों ही मनुष्य के लिए स्पष्ट विशिष्टताएं मानी जाती हैं। यद्यपि इमाम हुसैन (अ) ने इन विशिष्टताओं को ही अपने लिए पर्याप्त नहीं समझा। उन्होंने बचपन से ही हर क्षेत्र में प्रयास किये और अपने बुद्धिमान पिता के निरीक्षण में अनेक बातें सीख कर दक्ष हुए। इमाम हुसैन ने अपने पिता से यह सीख था कि मनुष्य की सुन्दरता उसकी बुद्धि और विचारों में निहित है। वे स्वयं भी इस मार्ग पर चलते हुए महानता के गौरव के शिखर तक पहुंचे थे।
अज़ीज़ शब्द का अर्थ होता है शक्तिशाली, सक्षम, सज्जन और सम्मानीय। अज़ीज़, ईश्वर का एक नाम है। वे लोग जो, लोगों की दृष्टि में अत्यधिक सम्मान के स्वामी होते हैं, और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हाथ किसी के सामने नहीं फैलाते, एसे लोगों को अज़ीज़ कहा जाता है। ईश्वर को अज़ीज़ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह लोगों से आवश्यकता मुक्त है जबकि पूरी सृष्टि को उस अनंतदाता की आवश्यकता है और रहेगी।
महापुरूषों ने सम्मान को मनुष्यों के लिए पसंद किया है और लोगों से यह चाहा है कि वे स्वयं को इस प्रशंसनीय विशेषता से सुसज्जित करें। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के दृष्टिकोण में हर वह व्यक्ति जिसका जीवन सदैव सम्मान के साथ व्यतीत होता है वह दृढ संकल्प वाला एव अजेय होता है। प्रतिष्ठित व्यक्ति प्रभुत्व एवं सम्मान के साथ स्वतंत्र जीवन का चयन करता है और परिपूर्णता के मार्ग को तै करता है। 
इमाम हुसैन (अ) के विचारों के आधार पर मनुष्य के भीतर सुन्दरता का अन्य मानदंड, सांसारिक मायामोह की ओर ध्यान न देना है। वे सबका ध्यान इस महत्वपूर्ण विशेषता की ओर आकृष्ट करते हुए कहते हैं कि धरती पर जिस चीज़ पर भी सूर्य का प्रकाश पड़ता है पूर्व से पश्चिम तक, जल से थल तक, पर्वत से पठार तक, सबकुछ उस व्यक्ति की दृष्टि में, जो ईश्वर की पहचान रखता है, तेज़ी से गुज़र जाने वाली उस छाया की भांति है जिससे दिल नहीं लगाया जा सकता। क्या यह उचित नहीं है कि इस मूल्यहीन संसार को संसार प्रेमियों के लिए छोड़ दिया जाए? हे लोगो! स्वयं को नश्वर संसार के लिए न बेचो। जान लो कि स्वर्ग के अतिरिक्त कोई अन्य वस्तु तुम्हारा मूल्य नहीं हो सकती। हर व्यक्ति जो इस संसार से प्रेम करे और ईश्वर की उपस्थिति में इसी क्षणिक संसार को सबकुछ समझे तो वह बहुत ही तुच्छ वस्तु पर सहमत हो गया है। प्रतिवर्ष जब हम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद मनाते हैं तो एसे लोगों के साक्षी बनते हैं जिन्होंने इमाम की महानता और उनकी विशेषताओं से प्रभावित होकर एक अच्छा जीवन प्राप्त किया। 
सर्वेक्षणों से यह बात स्पष्ट होती है कि बहुत से लोग जो मुसलमान हुए हैं वे पैग़म्बरे इस्लाम (स) और हज़रत अली (अ) जैसे महापुरूषों के अस्तित्व तथा इमाम हुसैन (अ) की अमर शौर्यगाथा से प्रभावित रहे हैं। वर्तमान समय में भी बहुत से लोग पवित्र लोगों को आदर्श बनाकर अपनी आध्यात्मिक प्यास बुझाते हैं। 
बहुत से एसे लोग जिन्होंने वर्चस्ववादियों के वर्चस्व के मुक़ाबले में प्रतिरोध किया है उन्होंने अपने प्रतिरोध में दृढ़ता एवं स्वतंत्रता को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से सीखा है। इस एतिहासिक तथ्य को लेबनान के ईसाइयों के तत्कालीन साहित्य में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
कुछ ईसाई साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं और कविताओं में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व के शौर्य एवं साहस वाले आयाम और उनके महान आन्दोलन की ओर विशेष ध्यान दिया है। लेबनान के एक ईसाई साहित्यकार "बोलेस सलामे" उन साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने अपनी कविताओं में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के प्रति अपने प्रेम और अपनी निष्ठा को दर्शाया है। वे लिखते हैं कि अरब कवि चाहे वह मुसलमान हो या ईसाई वह इस्लाम का ऋणी है। इसका कारण यह है कि यह संभव ही नहीं है कि कोई वाकपटुता के बारे में लिखे किंतु उसने किसी भी रूप में पवित्र क़ुरआन से लाभ न उठाया हो। हो सकता है कि कोई आपत्ति करे और कहे कि क्यों एक ईसाई ने इस्लाम के इतिहास की व्याख्या का कार्य आरंभ किया है? हां मैं ईसाई हूं किंतु एसा ईसाई जिसका दृष्टिकोण विस्तृत एवं व्यापक है। हर समय जब मैं अली और उनके सुपुत्र हुसैन के जीवन को याद करता हूं तो मेरे सीने में सच्चाई की सहायता करने और असत्य से संघर्ष करने की ज्वाला भड़क उठती है।
सीरिया के एक ईसाई साहित्यकार एवं पत्रकार "आन्तोवान बारा" इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को पूरे संसार से संबन्धित मानते हैं और उनको इन शब्दों में परिचित करवाते हैं कि "हुसैन धर्मों का अमर रत्न" हैं और अपनी बात को इस वाक्य के साथ समाप्त करते हैं कि "हुसैन मेरे हृदय में है"।
वे आगे कहते हैं कि हमने हर सुन्दर चीज़ की समीक्षा की और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वे समस्त सुन्दरताएं इमाम हुसैन, इमाम अली और पैग़म्बरे इस्लाम के व्यक्तित्व में निहित हैं। एक बार दमिश्क़ में एक सम्मेलन में सीरिया के कवि "मुहम्मद अर्रेफ़ाई" ने मेरे बारे में कहा था कि आंत्वान का धर्म ईसाई, उसकी पहचान मुसलमान, उसका प्रेम शीयत और उसकी भाषा अरबी है। वास्तविकता यह है कि मैं हुसैन से प्रेम करता हूं। मैं हुसैन की क्रांतिकारी आत्मा का दीवाना हूं। क्रांतिकारी आत्मा के साथ उनकी विनम्रता, इमाम हुसैन के व्यक्तित्व का वह अन्य आयाम है जिसने मुझको अपना दीवाना कर रखा है। शत्रुओं के मुक़ाबले में सम्मान, स्वतंत्रता एवं गौरव की भावना के साथ ही उनमें विनम्रता की भावना भी पाई जाती थी जबकि यह विशेषताएं एक व्यक्ति में एक समय में एकत्रित नहीं हो सकतीं। "आन्तवानबारा" इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को मार्ग प्रशस्त करने वाले तथा मोक्षदाता के रूप में इस्लाम के दीप तथा धर्म को हर प्रकार की क्षति से सुरक्षित रखने वाला होने के कारण इस्लामी कवच की संज्ञा देते हैं। 
एक क़सीदे में "जोज़फ़ हाशिम" कहते हैं कि जब अनेकेश्वरवाद व भ्रष्टाचार पूरे संसार में फैल गया तो ईश्वर ने अपने बंदों को मोक्ष दिलाने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों को भेजा ताकि सत्य को जातियों के बीच प्रचलित करें। हे फ़ातेमा और अली के सुपुत्र क्या इससे बढ़कर भी कोई महानता है? हे वे लोगों, जिनको हर प्रकार की महानता अपने पूर्वजों से मिली है, संसार के रंगारंग प्रलोभन तुमको धोखा नहीं दे सके और तुमने अपनी महान आत्मा को बलि के लिए प्रस्तुत किया। यदि आप न होते तो कोई भी ईश्वरीय ध्वज फहर न पाता। आप केवल अपने शीयों के ही मार्गदर्शक नहीं हैं बल्कि आप समस्त लोगों के मार्गदर्शक हैं जिसने धरती पर ईमान के महत्व को ऊंचाइयां दीं और मनुष्य की सुन्दरताओं को स्पष्ट किया।
यहां पर हम लेबनान के एक अन्य लेखक "नस्री सलहब" के विचारों से आपको अवगत करवाते हैं जिससे उनकी एक रचना आरंभ होती है। 
वे हज़रत अली अलैहिस्सलाम की महानता, उनके संघर्ष और वर्तमान समय में उनकी आवश्यकता का उल्लेख करने के बाद लिखते हैं कि हे शहीदों के सरदार, मेरा संबन्ध एसे देश से है जहां पर ईसाई और मुसलमान दोनों ही कमज़ोर हैं।
कृप्या मुझको अनुमति दीजिए कि मैं अपने घायल हृदय से निकलने वाली बातें कहूं। मैं इसलिए आया हूं ताकि आपके मार्ग पर क़दम बढ़ाऊं और आपसे एसी ज्वाला प्राप्त करूं जो मेरे भीतर महानता को प्रजवलित करे ताकि पहले तो मैं अपने आंतरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकूं और फिर अपने बाहरी शत्रु पर, जिसने मेरी मात्रभूमि को दूषित कर दिया और सम्मान को ठेस पहुंचाई है। सुन्दर जीवन और सम्मानीय मृत्यु के साथ हुसैन सदैव के लिए लोगों की अंतरात्माओं में अमर हो गए। क्यों न हम भी अपनी लूटी गई मातृभूमि, (लेबनान) घायल राष्ट्र और अपने रक्त के सम्मान के लिए रणक्षेत्र की ओर क़दम बढ़ाएं? क्यों न हम हुसैन की भांति, जो करबला का ही नहीं बल्कि हर काल का नायक है ज़बान और व्यवहार से अपनी बात कहें। महान व्यक्ति के लिए मृत्यु बुरी नहीं है। यदि वे जीवित बच जाते हैं तो पछताते नहीं और यदि मर गए तो उन्हें बुरा-भला नहीं कहा जाएगा क्योंकि मनुष्य के अपमान के लिए इतना ही पर्याप्त है कि वह वर्चस्व में जीवन व्यतीत करे।
लेबनान के एक अन्य विख्यात साहित्यकार "एडमंड रिज़क़" अपने एक लेख में लिखते हैं कि इतिहास में मुझको कोई एसा कारवां दिखाई नहीं पड़ता जिसके बारे में मैं यह कामना करूं कि मैं भी उसमें से होता। एसा कारवां जिसने अली और फ़ातेमा के सुपुत्र के नेतृत्व में हेजाज़ से इराक़ की यात्रा की ताकि स्वयं को न्योछावर करके सच्चाई को जीवित किया जाए। मेरे मन ने कभी भी यह नहीं चाहा कि मैं कोई तीर फेकूं या भाला चलाऊं किंतु उस दिन जब किशोरावस्था में मैने हुसैन की कहानी सुनी जिसने ईश्वर पर भरोसा करते हुए अपनी तलवार का सहारा लिया। वे आगे कहते हैं कि लोगों और निर्णयों के बीच परस्पर संपर्क होता है। लोग निर्णय लेते हैं और निर्णय उनको शिखर तक पहुंचाते हैं। हे हुसैन वह चीज़ जो आपकी छवि बनाती है और आपकी स्थिति को समय के स्तर पर स्पष्ट करती है वह बलिदान के लिए आपका उच्च निर्णय है क्योंकि शक्ति उसी में है जबकि विदित रूप कमज़ोर दिखाई दे रहा हो। 
यहां पर हम लेबनान के एक अन्य लेखक "नस्री सलहब" के विचारों से आपको अवगत करवाते हैं जिससे उनकी एक रचना आरंभ होती है। 
वे हज़रत अली अलैहिस्सलाम की महानता, उनके संघर्ष और वर्तमान समय में उनकी आवश्यकता का उल्लेख करने के बाद लिखते हैं कि हे शहीदों के सरदार, मेरा संबन्ध एसे देश से है जहां पर ईसाई और मुसलमान दोनों ही कमज़ोर हैं।
कृप्या मुझको अनुमति दीजिए कि मैं अपने घायल हृदय से निकलने वाली बात कहूं। मैं इसलिए आया हूं ताकि आपके मार्ग पर क़दम बढ़ाऊं और आपसे एसी ज्वाला लूं जो मेरे भीतर महानता को प्रजवलित करे ताकि पहले तो मैं अपने आंतरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकूं और फिर अपने बाहरी शत्रु पर, जिसने मेरी मात्रभूमि को दूषित कर दिया और सम्मान को ठेस पहुंचाई है। सुन्दर जीवन और सम्मानीय मृत्यु के साथ हुसैन सदैव के लिए लोगों की अंतरात्माओं में अमर हो गए। क्यों न हम भी अपनी लूटी गई मातृभूमि, (लेबनान) घायल राष्ट्र और अपने रक्त के सम्मान के लिए रणक्षेत्र की ओर क़दम बढ़ाएं? क्यों न हम हुसैन की भांति, जो करबला का ही नहीं बल्कि हर काल का नायक है ज़बान और व्यवहार से अपनी बात कहें। महान व्यक्ति के लिए मृत्यु बुरी नहीं है। यदि वे जीवित बच जाते हैं तो पछताते नहीं और यदि मर गए तो उन्हें बुरा-भला नहीं कहा जाएगा क्योंकि मनुष्य के अपमान के लिए यह पर्याप्त है कि वह वर्चस्व में जीवन व्यतीत करे।(तेहरान रेडियो की हिन्दी सेवा के धन्यवाद के साथ)
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