इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम
कोड: 334371 दिनांक: 2012/08/04 - 19:34स्रोत: print

15 रमज़ानः
इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम

इमाम हसन अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व का महत्व पैग़म्बरे इस्लाम के इस कथन से होता है जिसमें आपने कहाः जान लो कि हसन ईश्वर की ओर से मेरे लिए उपहार है 

 इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम
पंद्रह रमज़ान उस महान हस्ती का शुभ जन्म दिवस है जो नैतिक मूल्यों व दया की खज़ाना था। तीन हिजरी को आज ही के दिन ईश्वर ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा को एक बेटा दिया जिसका नाम पैग़म्बरे इस्लाम ने ईश्वरीय संदेश वही के अनुसार हसन रखा जिसका अर्थ होता है अच्छा व प्रिय। इमाम हसन अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व का महत्व पैग़म्बरे इस्लाम के इस कथन से होता है जिसमें आपने कहाः जान लो कि हसन ईश्वर की ओर से मेरे लिए उपहार है। वह हमारे बारे में तुम्हें जागरुक बनाएंगे और लोगों को मेरे ज्ञान के प्रभाव से अवगत कराएंगे। वह मेरे आचरण व जीवन शैली को जीवित करेंगे। क्योंकि उनका व्यवहार मेरे व्यवहार के समान है। ईश्वर की उन पर कृपा है। ईश्वर उस पर कृपा करे जो उन्हें (हसन को) पहचाने और मेरे सम्मान में उनके साथ भला व्यवहार करे।            पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के आकर्षक व्यक्तित्व व नैतिक खिंचाव का कारण यह था कि वे उनका व्यक्तित्व नैतिक मानदंडों पर आधारित था। ऐसे गुण जिसकी ओर मनुष्य स्वाभाविक रूप से आकर्षित होता है। इमाम हसन अलैहिस्सलाम करीमे अहलेबैत के नाम से प्रसिद्ध थे। करीम का अर्थ होता है, दानशीलता, सज्जनता और सद्गुणों से संपन्न व्यक्ति। पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों के आधार पर करीम उन सद्गुणों का समूह है जो करीम व्यक्ति को दूसरे से विशिष्टता प्रदान करता है। इमाम हसन अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म दिवस की हार्दिक बधाइयों के साथ उनकी तीन व्यवहारिक विशेषताओं की ओर संकेत करें। आशा करते हैं कि पवित्र रमज़ान के महीने में जो नैतिक मूल्यों से सुसज्जित होने का महीना है, इस पवित्र महीने में जन्म लेने वाली हस्ती के आचरण से प्रेरणा लेते हुए भलाई में एक दूसरे आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे। इस्लामी नियम में धनवानों पर निर्धनों व ज़रूरतमंद के मुक़ाबले में बड़ा दायित्व है और धार्मिक बंधुत्व व गहरे आत्मिक संबंधों का तक़ाज़ा है कि वे वंचितों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सदैव प्रयासरत रहें। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों ने न केवल यह कि इस संदर्भ में बहुत बल दिया है बल्कि उनमें से हर एक अपने काल में मानवता प्रेम का श्रेष्ठ नमूना समझे जाते थे। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम, हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा की छत्रछाया में दानशीलता को अपने व्यक्तित्व में उतारा था और पवित्र क़ुरआन की वे आयतें उन्हीं पर चरितार्थ होती हैं जिनमें ईश्वर दानियों व सदाचारियों की प्रशंसा करता है। इमाम हसन अलैहिस्सलाम के पास जो होता वे लोगों को खाने के दस्तरख़ान पर दे देते थे। वे भले तथा ईश्वर को प्रिय कर्म करने में भरपूर प्रयास करते थे और अपने बहुत अधिक धन को ईश्वर के मार्ग में बांट दिया। इतिहासकारों व विद्वानों ने इमाम हसन के गौरवपूर्ण जीवन के वर्णन में उनके द्वारा किए गए दान का उल्लेख किया है जिससे पता चलता है कि इमाम हसन इस धूर्त्तापूर्ण संसार के दिखावों की परवाह नहीं करते थे। अबु नईम अपनी किताब हुल्यतुल अबरार में लिखते हैः हसन बिन अली ने तीन बार अपनी धन-संपत्ति को दो भागों में विभाजित किया और हर बार उसके आधे भाग को ईश्वर के मार्ग में दान कर दिया। यहां तक कि यदि उनके पास दो जोड़ी जूते होते तो एक अपने लिए रखते और दूसरा ज़रूरतमंद को दे देते थे। इमाम हसन अलैहिस्सलाम का अस्तित्व पीड़ितों, ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के लिए आश्रय के समान था। इसी प्रकार उनका अस्तित्व बेसहारा लोगों के लिए आशा की किरण था। कोई भी निर्धन उनके द्वार से ख़ाली हाथ नहीं पलटता था। कोई भी ऐसा दुखी न था जो अपनी समस्या को इमाम हसन अलैहिस्सलाम से कहता और वे उसके मन से दुख को दूर न करते। इमाम हसन अलैहिस्सलाम की जीवनी में मिलता है कि एक दिन एक व्यक्ति इमाम हसन के पास आया। उन्होंने अपने नौकरों से कहा कि जो कुछ हमारे है उसे दे दो। नौकर बीस हज़ार दिरहम लेकर आए और इससे पहले की वह ज़रूरतमंद अपनी आवश्यकता का उल्लेख करता इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने सारा पैसा उसे दे दिया। वह ज़रूरतमंद व्यक्ति इमाम हसन अलैहिस्सलाम के दानशीलता भरे व्यवहार से आश्चर्यचकित रह गया और उसने कहाः मेरे आक़ा आपने मुझे अपनी आवश्यकता का उल्लेख तक नहीं करने दिया। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः हम ज़रूरतमंद को उसके अनुरोध से पहले दे दिया करते हैं ताकि उसके माथे पर लज्जा से पसीना प्रकट न हो सके। इमाम हसन अलैहिस्सलाम से किसी ने पूछाः आप क्यों किसी ज़रूरतमंद को निराश नहीं लौटाते? इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः मैं ईश्वर के निकट ज़रूरतमंद हूं और मैं ईश्वर से चाहता हूं कि वह मुझे वंचित न करे। इसलिए मुझे भी लज्जा आती है कि में ज़रूरतमंद को निराश करूं। ईश्वर ने जो मुझे अनुकंपाएं दी हैं वह चाहता है कि उनसे लोगों की सहायता करूं।    इमाम हसन के व्यवहार में विनम्रता भरी हुयी थी जिससे उनके महान आचरण का पता चलता है। विनम्रता, व्यक्ति की अंतर्दृष्टि का पता देती है। मनुष्य में ईश्वर की पहचान जितनी बढ़ती जाएगी वह उतना ही विनम्र होता जाएगा क्योंकि घमंड व अहं अज्ञानता व मूर्खता के कारण आता है। ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन में घमंड की कड़ाई से भर्त्सना और विनम्रता की प्रशंसा की है। पैग़म्बरे इस्लाम की भांति उनके पवित्र परिजन भी लोगों से बहुत विनम्रता से मिलते थे। इमाम हसन अलैहिस्सलाम की जीवनी में मिलता है कि वे बड़ी विनम्रता के साथ निर्धनों के बीच उठते बैठते और उन्हें अपने घर आमंत्रित कर उनका सम्मान करते और उन्हें खाना व वस्त्र देते थे। इमाम हसन अलैहिस्सलाम विनम्रता के संबंध में कहते हैः ईश्वर के निकट उसका स्थान सबसे ऊंचा है जो आम लोगों के अधिकार को पहचानता और उसे अदा करने का प्रयत्न करता है। जो व्यक्ति अपने धर्म-बंधु के सामने विनम्रता दिखाता है तो ईश्वर उसे सच्चों की श्रेणी में रखेगा। प्रसिद्ध मुसलमान इतिहासकार इब्ने शहर आशोब अपनी किताब मनाक़िबे आले अबी तालिब में लिखते हैः एक दिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम निर्धनों के बीच गुज़र रहे थे जो ज़मीन पर बैठे सूखी रोटी के टुकड़े खा रहे थे। जब उन निर्धनों ने इमाम हसन को देखा तो उन्हें अपने साथ बैठ कर खाने के लिए आमंत्रित किया। इमाम हसन ने तुरंत उनके निमंत्रण को स्वीकार किया और उनके साथ बैठ कर खाने लगे और कहाः ईश्वर घमंडी को पसंद नहीं करता। उसके बाद इमाम हसन अलैहिस्सलान ने उन निर्धनों से अपने साथ घर चलने के लिए कहा और उन्हें खाना और कपड़े दिए।   मनुष्य ने अपने जीवन के अनुभव से यह सीखा है कि विपत्तियों की स्थिति में धैर्य व संयम  मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति है। पवित्र क़ुरआन में भी धैर्य व संयम को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। जैसाकि सूरए राद की आयत क्रमांक 24 में धैर्यवानों को प्राप्त इस विशिष्टता की ओर संकेत करता है कि जिस समय मनुष्य परलोक की ओर तेज़ी से बढ़ेंगे जब अपने सदकर्म के अंजाम तक पहुंचना चाहेंगे तो ईश्वरीय फ़रिश्ते उनसे कहेंगेः तुम्हारे धैर्य व दृढ़ता के लिए तुम पर सलाम हो। इतिहास भी इस वास्तविकता का साक्षी है कि धैर्यवान ही जीवन के विभिन्न मंचों पर वास्तव में सफल रहे हैं। इमाम हसन अलैहिस्सलाम के समय में बेइमानी, षड्यंत्र, संधियों का उल्लंघन, निराधार आरोप, और एक दूसरे को बुरा-भला कहना एक आम बात थी किन्तु इमाम हसन अलैहिस्सलाम बिना क्रोधित व भावुक हुए इन अनुचित रीतियों के विरुद्ध भले ढंग से डट गए। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने इस्लाम के ध्वज को फहराने व इस्लाम सहायता करने के लिए धैर्य का सहारा लिया और षड्यंत्र व संधियों का उल्लंघन उनकी दृढ़ता व धैर्य में बाधा नहीं बन सका। एक दिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम से हिल्म का अर्थ पूछा गया तो इमाम ने कहाः हिल्म का अर्थ होता है क्रोध को पी जाना और अपने आप पर नियंत्रण रखना। इमाम हसन अलैहिस्सलाम जीवन में कठिनाइयों को पारितोषिक की कुंजी से उपमा देते हैं और मनुष्य को कठिनाइयों को सहन करने की अनुशंसा करते हुए कहते हैः जीवन की कठिनाइयां पारितोषिक की कुंजी है। इस्लाम की संवेदनशील स्थिति में इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने धैर्य से काम लेते हुए षड्यंत्रों से निपटने के लिए तार्किक व गंभीर शैली को अपनाया। वे पूरी दृढ़ता व शालीनता के साथ भ्रष्ट विचारों प्रक्रियाओं के सामने डट गए और षड्यंत्रों व हंगामों के काल में लोगों के मार्गदर्शन का ईश्वरीय दायित्व निभाया। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने छह महीने तक इस्लामी शासन का नेतृत्व संभाला। उस समय विरोधियों व शत्रुओं ने नाना प्रकार के षड्यंत्र रचे यदि इमाम हसन अलैहिस्सलाम की समझबूझ व धैर्य न होता तो इस्लाम का आधार ढह जाता। मोआविया की चालों और इमाम हसन से युद्ध की उसकी तय्यारी के कारण इस्लामी समाज की उथल पुथल स्थिति थी। चूंकि इमाम हसन अलैहिस्सलाम के पास निष्ठावान व बलिदान देने के लिए तत्पर रहने वाले साथियों की कमी थी इसलिए उन्होंने युद्ध से पीछे हटने का बेहतर समझा और मोआविया के साथ शांति समझौते को स्वीकार कर लिया। अलबत्ता इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने मोआविया के साथ संधि में कुछ शर्तें रखी थीं। ये शर्तें पवित्र क़ुरआन के आदेशों और पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण को अपनाए न जाने की ओर से चिंता को दर्शती है और इसी प्रकार इस्लाम के भविष्य के संबंध में इमाम हसन के चिंतित रहने की सूचक हैं। इमाम हसन अलैहिस्सलाम शांति समझौते पर हस्ताक्षर के पश्चात अपनी जन्मस्थली मदीना नगर लौट गए और अपनी मूल्यवान आयु के बचे हुए दस वर्ष को पूरी वीरता और धैर्य के साथ जनता के मार्गदर्शन में बिताया। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने इन वर्षों में इस्लामी जगत के वैचारिक व आस्था के आधारों को सुदृढ़ किया और विभिन्न अवसरों पर उमवी शासकों के अनुचित क्रियाकलापों की खुल कर आलोचना की।(एरीब डाट आई आर के धन्यवाद के साथ)
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